हर एक सुबह निकल पड़ता है जो खुद क़ी तलाश मे
वो खोई हुई वो पहचान हूँ मैं....................... ..........
ना आँखों मे ख्वाब है ना दिल मे तमन्ना है कोई,
अपनी बनाई हुई राहों से हीं अंजान हूँ मैं.............
कभी ज़रा सी भी बात पर आँसू बहा देता था मैं,
आज रह मे पड़ी लाश क़ी तरह बेजान हूँ मैं........
आँखो मैं ख्वाब संजोने क़ी भी सज़ा हुई है मुझे,
खिलने से पहले ही टूट जाए एक ऐसा अरमान हूँ मैं..........
किस कदर फरेब करता है समुंदर एक कश्ती से,
इस जिंदगी के हर एक ज़ुल्म का निगहेबान हूँ मैं............
जाने कितने ही अरमान कुम्प दबा चुका है अपने सिने मे,
अब तो लगता है जैसे खुद ही एक कब्रिस्तान हूँ मैं.
वो खोई हुई वो पहचान हूँ मैं.......................
ना आँखों मे ख्वाब है ना दिल मे तमन्ना है कोई,
अपनी बनाई हुई राहों से हीं अंजान हूँ मैं.............
कभी ज़रा सी भी बात पर आँसू बहा देता था मैं,
आज रह मे पड़ी लाश क़ी तरह बेजान हूँ मैं........
आँखो मैं ख्वाब संजोने क़ी भी सज़ा हुई है मुझे,
खिलने से पहले ही टूट जाए एक ऐसा अरमान हूँ मैं..........
किस कदर फरेब करता है समुंदर एक कश्ती से,
इस जिंदगी के हर एक ज़ुल्म का निगहेबान हूँ मैं............
जाने कितने ही अरमान कुम्प दबा चुका है अपने सिने मे,
अब तो लगता है जैसे खुद ही एक कब्रिस्तान हूँ मैं.
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