शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

परहित समान कोई काम नही

पानी क़ी दौ बूँद में समुंदर मिला मुझे
रोटी के टुकड़े मे लिपटा खंजर मिला मुझे,
प्यासे से मरते को पानी पिलाया,
रोटी के लिए लड़ते को भोजन खिलाया,
जहाँ नज़र गयी नज़ारा  देख पाया,
इसीलिए मैं नजरअंदाज़ ना कर पाया......
लोग मुझे फरिश्ता कहने लगे, 
मेरी बस्ती के निकट रहने लगे,
बेकारो को काम दिलवाया,
इन नज़ारो ने ही मुझे ईश्वर से मिलाया
मैं ढूंढता था पत्थरों मे उसको,
वो ही मेरे ही अंदर आज मिल पाया,
परहित समान कोई काम नही,
जनसेवा से बढ़कर कोई धाम नही.......................

2 टिप्‍पणियां: