पानी क़ी दौ बूँद में समुंदर मिला मुझे
रोटी के टुकड़े मे लिपटा खंजर मिला मुझे,
प्यासे से मरते को पानी पिलाया,
रोटी के लिए लड़ते को भोजन खिलाया,
जहाँ नज़र गयी नज़ारा न देख पाया,
इसीलिए मैं नजरअंदाज़ ना कर पाया......
लोग मुझे फरिश्ता कहने लगे,
मेरी बस्ती के निकट रहने लगे,
बेकारो को काम दिलवाया,
इन नज़ारो ने ही मुझे ईश्वर से मिलाया
मैं ढूंढता था पत्थरों मे उसको,
वो ही मेरे ही अंदर आज मिल पाया,
परहित समान कोई काम नही,
जनसेवा से बढ़कर कोई धाम नही.......................
रोटी के टुकड़े मे लिपटा खंजर मिला मुझे,
प्यासे से मरते को पानी पिलाया,
रोटी के लिए लड़ते को भोजन खिलाया,
जहाँ नज़र गयी नज़ारा न देख पाया,
इसीलिए मैं नजरअंदाज़ ना कर पाया......
लोग मुझे फरिश्ता कहने लगे,
मेरी बस्ती के निकट रहने लगे,
बेकारो को काम दिलवाया,
इन नज़ारो ने ही मुझे ईश्वर से मिलाया
मैं ढूंढता था पत्थरों मे उसको,
वो ही मेरे ही अंदर आज मिल पाया,
परहित समान कोई काम नही,
जनसेवा से बढ़कर कोई धाम नही.......................

bahut barhiya... following your blog
जवाब देंहटाएंaakarshan
बहुत प्यारी कविता है...अच्छी लगी...
जवाब देंहटाएंब्लॉग भी फालो कर लिया है...