मुझे तलाश थी उन आँखो की, जो कभी बरसे ना हो,
मुझे तलाश थी उस शख्स क़ी, जिसके कोई चर्चे ना हो,
मुझे तलाश थी उन कानो क़ी ,जो कान कभी तरसे ना हो,
मुझे तलाश नही थी ऐसे जहाँ कि जहाँ इंसान रहते ना हो,
आखें मिली डुबी हुई,कान मिले खाते पकवान,
इंसान मिला मज़हब मे जकड़ा,दुनिया क़ी सैर कर ली,
कभी आँखे बंद तो कभी खुली,जी रहा हूँ जिंदगी हौसलों को करके तकड़ा........@कुम्पसिंह
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें