शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

परहित समान कोई काम नही

पानी क़ी दौ बूँद में समुंदर मिला मुझे
रोटी के टुकड़े मे लिपटा खंजर मिला मुझे,
प्यासे से मरते को पानी पिलाया,
रोटी के लिए लड़ते को भोजन खिलाया,
जहाँ नज़र गयी नज़ारा  देख पाया,
इसीलिए मैं नजरअंदाज़ ना कर पाया......
लोग मुझे फरिश्ता कहने लगे, 
मेरी बस्ती के निकट रहने लगे,
बेकारो को काम दिलवाया,
इन नज़ारो ने ही मुझे ईश्वर से मिलाया
मैं ढूंढता था पत्थरों मे उसको,
वो ही मेरे ही अंदर आज मिल पाया,
परहित समान कोई काम नही,
जनसेवा से बढ़कर कोई धाम नही.......................

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

मुझे तलाश थी

मुझे तलाश थी उन आँखो की, जो कभी बरसे ना हो,
मुझे तलाश थी उस शख्स क़ी, जिसके कोई चर्चे ना हो,
मुझे तलाश थी उन कानो क़ी ,जो कान कभी तरसे ना हो,
मुझे तलाश नही थी ऐसे जहाँ कि जहाँ इंसान रहते ना हो,
आखें मिली डुबी हुई,कान मिले खाते पकवान,

इंसान मिला मज़हब मे जकड़ा,दुनिया क़ी सैर कर ली,
कभी आँखे बंद तो कभी खुली,जी रहा हूँ जिंदगी हौसलों को करके तकड़ा........@कुम्पसिंह

कुंपसिंह का सलाम


जाते जाते मेरा पैगाम लेता जा हे दिनकर.......
मेरे सभी दोस्तो को सलाम कहता जा हे प्रभाकर.....
दिनभर के कहानियों की दास्तान ब्यान करता जा हे भानु......
आने वाली रात की कहानी बताता जा हे भास्कर..............
कल जल्दी लौट आना हे धूपकर......
...उदय होते ही मुझे जल्दी जगाना हे सूरज...............
तुझे उठाते ही नमस्कार करता हूँ रोज में रवि...............
टे ही गाथाएँ गाये हर शायर और कवि.........................
तुझे मिहिर भी कोई कहता है कोई कहे रोहित....
तुम्हारी दीवानी सी रहती है सदा चाँदनी रात तुझपे मोहित.......
अरुण नाम भी है तेरा....अटल अवि है तू सदा ही वक्त पर है आता.....
दीपेश और सुकेत भी तेरी रोशनी मे जगमगाएँ सारा जहाँ है गाता.......
कुंपसिंह का सलाम लेता जा हे आदित्य.....कल जल्दी लौट आना फिर जगमगाता...सभी मित्रो को इस निराली शाम का सलाम.........

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

नींद नही आती बस ख्वाब आते है

नींद नही आती बस ख्वाब आते है
ख्वाब आते है तो आप आते है 
ऐसी कशमकश मे रात बीत जाती है
ना नींद आती है ना आप आती है

सोमवार, 23 अगस्त 2010

चर्चा मेँ रहने के दौ रास्ते हैँ, कुख्यात व विख्यात, ये दौनोँ सगे भाई हैँ जिनकी माँ जन्म देते ही इस दुनिया से चल बसी..

रविवार, 22 अगस्त 2010

उम्मीद

इस नदीँ की धार मेँ ठंडी हवा आती तो हैँ, नाव जर्जर ही सही लहरोँ से टकराती तो हैँ। एक चिनगारी कहीँ से ढूँढ लाओ दोस्तोँ, इस दिपक मेँ भीगी हुई बाती तो हैँ। दुःख नहीँ कोई कि अब उपलब्धियोँ के नाम पर, और कुछ हो या न हो आकाश-सी छाती तो हैँ। एक सादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी. यह अँधेरे की सङक उस भोर तक जाती तो हैँ।

मूर्ख संगत

पहाङो के दुर्गम स्थानोँ मेँ कोल-भीलोँ के साथ भटकना भी अच्छा है. परन्तु मुर्ख लोगोँ के साथ इन्द्र के भवनोँ मेँ भी रहना अच्छा नहीँ हैँ :