रविवार, 22 अगस्त 2010

उम्मीद

इस नदीँ की धार मेँ ठंडी हवा आती तो हैँ, नाव जर्जर ही सही लहरोँ से टकराती तो हैँ। एक चिनगारी कहीँ से ढूँढ लाओ दोस्तोँ, इस दिपक मेँ भीगी हुई बाती तो हैँ। दुःख नहीँ कोई कि अब उपलब्धियोँ के नाम पर, और कुछ हो या न हो आकाश-सी छाती तो हैँ। एक सादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी. यह अँधेरे की सङक उस भोर तक जाती तो हैँ।

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