सोमवार, 23 अगस्त 2010
रविवार, 22 अगस्त 2010
उम्मीद
इस नदीँ की धार मेँ ठंडी हवा आती तो हैँ, नाव जर्जर ही सही लहरोँ से टकराती तो हैँ। एक चिनगारी कहीँ से ढूँढ लाओ दोस्तोँ, इस दिपक मेँ भीगी हुई बाती तो हैँ। दुःख नहीँ कोई कि अब उपलब्धियोँ के नाम पर, और कुछ हो या न हो आकाश-सी छाती तो हैँ। एक सादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी. यह अँधेरे की सङक उस भोर तक जाती तो हैँ।
मूर्ख संगत
पहाङो के दुर्गम स्थानोँ मेँ कोल-भीलोँ के साथ भटकना भी अच्छा है. परन्तु मुर्ख लोगोँ के साथ इन्द्र के भवनोँ मेँ भी रहना अच्छा नहीँ हैँ :
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